Showing posts with label hindi poem. Show all posts
Showing posts with label hindi poem. Show all posts

Thursday, October 24, 2013

ऐ हवा , ना रुको तुम........

ऐ हवा ,
ना रुको तुम,
बहती चलो,
संग  ले कर चलो तुम,
नयी रिश्तों की खुश्बोएं,
और
इधर-उधर बिखरी
बीती यादों की धूल.

रुक जाओंगी मैं,
अब न चलूंगी संग तुम्हारे,
कुछ देर,
अपने गुलमोहर की छाँव में बैठ,
लाल सुरख़ फूलों से
कुछ कहूँगी
और कुछ सुनूंगी।
बहुत बहकी तुम्हारे संग,
अब कुछ ठहर जाओंगी।

ऐ हवा ,
ना रुको तुम,
बहती चलो,
संग  ले कर चलो तुम,
नयी मंजिलों के सिलसिले ,
और
इधर-उधर बहके 
डगमगाए क़दमों के चिन्ह!










                           
                              

Sunday, July 7, 2013

बहुत कुछ बदल गया है………. यह घर, यह रेत , मैं और तुम.

बहुत कुछ बदल गया है……….
यह घर, यह रेत , मैं और तुम.

एक तूफ़ान था आया,
तेज़ हवा के झोंके लाया,
छत उढ़ी,
दीवारें टूटी,
दरवाज़े पे लटकी तोरेन टूटी ...
कपढ़े बिखरे,
बर्तन बिखरे,
शादी का वोह लाल जोढ़ा भी बिखरा ...
खिढकी टूटी,
चौखट टूटी,
तेरी राह देखती मेरी नज़र भी टूटी ...



एक तूफ़ान था आया,
तेज़ हवा के झोंके लाया,
ऊँट बहके,
मुसाफिर बहके,
रेत पे चलते हर कदम बहके   ...
रंग बदला,
रूप बदला,
हर कण से चमकती रौशनी भी बदली ...
छाया बदली,
राह बदली,
तेरे तक पहुंचती हर चाल  भी बदली ...


एक तूफ़ान था आया,
तेज़ हवा के झोंके लाया,
बाल बिखरे,
कपढ़े  बिखरे,
नैनों  का काजल भी बिखरा ....
दिल भी रोया,
आँख भी रोई ,
तेरी याद में सिमटी हर स्मृति रोई ...
सरगम  टूटी,
ताल टूटी,
जीवन के नाच में तेरी मेरी जोड़ी भी टूटी  ...



एक तूफ़ान था आया,
तेज़ हवा के झोंके लाया,
नाम बदला,
घर बदला,
तेरा हर अंदाज़ बदला ...
नज़र छूटी ,
बात छूटी ,
तेरे घर से मेरी घर की राह भी छूटी ...
शबाब को लूटा,
शराब  में डूबा,
ज़िन्दगी का तेरा नशा ही टूटा।

बहुत कुछ डूब  गया है……….
शराब के सैलाब में ..
यह घर, यह रेत , मैं और तुम.



Wednesday, August 29, 2012

सकून बस चलते रहने में ही है

गिर गिर के उठ रहे हैं,
हर पल खुद से जूझ रहे हैं,
भरी हुई महफिलों में
दिल का सकून  ढूंढ रहे हैं!
इस महफ़िल में नहीं,
उस महफ़िल में नहीं,
सकून दिल में छुपे अथाह प्यार में ही है!

हर चाहत को संजोय हुए हैं,
सपने भी आँखों में बसाए हुए हैं,
हासिल की हुई मंजिलों में
दिल का सकून  ढूंढ रहे हैं!
इस चाहत में नहीं,
उस सपने में नहीं,
सकून मंजिल की ओर सदा चलने में ही है !


हाथों की लकीरों में कुछ ढूंढ रहे हैं,
आसमां के सितोरों से कुछ पूछ रहे हैं,
हर ढलती शाम में,
दिल का सकून  ढूंढ रहे हैं!
इस हाथ में नहीं,
उस  सितारे में नहीं,
सकून कुदरत के समर्पण में ही है!

बहती हुई  हवा से पूछ रहे हैं,
बरसते हुए पानी से पूछ रहे हैं,
बहती-बरसती बूँद बूँद में
दिल का सकून  ढूंढ रहे हैं!
हवा में नहीं,
पानी में नहीं,
सकून बस चलते रहने में ही है!



















Friday, March 9, 2012

जाने क्यूँ तेरे बिन ज़िन्दगी भी अधूरी सी है!


आँखों में नमी सी है,
दिल में खुमारी सी है,
तेरी एक झलक की तलब ही है,
जाने क्यूँ तेरे बिन ज़िन्दगी भी अधूरी सी  है!

दरवाज़े पे आहट सी है,
दिल में उम्मीद भी है,
नज़रों को तेरा इंतज़ार भी है,
जाने क्यूँ तेरे बिन ज़िन्दगी भी अधूरी सी  है!

इस राह पर तेरे क़दमों के निशाँ भी है,
साँसों में तेरी सांसों की महक भी है,
हर सांस में तेरा नाम ही है,
जाने क्यूँ तेरे बिन ज़िन्दगी भी अधूरी सी  है!

हर रंग में तेरे प्यार का रंग ही है,
फूलों पे जो बरस रहा वोह तेरा प्यार ही है,
तेरे प्यार की बूंदों से भीग रहा  मेरा मन भी  है,
जाने क्यूँ तेरे बिन ज़िन्दगी भी अधूरी सी  है!


हर दिन जो तेरे बिन गुज़र रहा वोह अधूरा ही है,
हर पल जो जिया  तेरे बिन बेजान सा ही  है,
मंजिल पे पहुँचने की ख़ुशी बेम्मानी सी है,
जाने क्यूँ तेरे बिन ज़िन्दगी भी अधूरी सी  है!

Sunday, February 26, 2012

आजाद रहना ही हमारा जीवन है!




आजाद रहना ही हमारा  जीवन है!


मैं आज़ाद  पंछी   हूँ
- मस्त नील गगन का,
- ऊँचे ऊँचे वृक्षों का
मत रोको मुझे
मत बांधो मुझे
उर्ढ़ने दो
खुली हवाओं में
इस द्डाल से उस द्डाल तक!

क्यों पकरते  हो?
क्यों प्यार में सहलाते हो?
क्यों बेबसी पर मुस्कराते हो?
दिल का दर्द देख नहीं पाते
तो क्यों झूठा प्रेम जताते हो?

तुमने जंगले काटे,
ऊँचे भवन बनाये,
नीर मेरा बिखरा
अंडे फूटे,
प्यासा,
ब्धावासा सा
मैं तर्ह्पा,
शरण तेरी आया,
खिढ़की  में नया घोंसला बनाया
पर तुझे यह भी रास न आया?
झट से एक पिंजरा बनवाया,
छल  से मुझे बुलाया,
पानी को  तरसता,
क्यों तेरी चाल न समझ पाया ?
प्रीतमा प्यार में चली आई,
मेरे पीछे अपनी आजादी भी गंवाई,
तू घमंड में हुआ चूर,
अपनी  लालसा में
देख न पाया प्यार हमारा !
तू ने समझा
पानी की दो बूंदों से
बाजरे की दो मुठी दानो से
चली वोह आई है,
क्या जानो तुम प्यार को,
मेरे मोह में  बंधी वोह चली आई है!!

देख के मुझे,
प्यार से वोह  कराही,
पर नादान हो तुम,
जो इसे सुख का इशारा समझा!
मेरे पंखों को जो उसने प्यार से सहलाया,
ताली बजा बजा के तुमने सब को बुलाया,
आँखों की नमी न देखी ,
प्यार की तर्ढ़प  न समझी,
देखा तो अपनी ख़ुशी देखी ,
समझा तो अपना हक समझा!

जाने दो,
उरः जाने दो,
न बांधों हमें,
वोह आसमान पुकारता है,
सूर्य के साथ चलने को मन करता है,
दिन ढलने पर अलूना में लौटने की चाहत है,
बारिश की बूँदें से पत्तों में छिपने  की ललक है,

मैं आज़ाद  पंछी   हूँ

- मस्त नील गगन का,
- ऊँचे ऊँचे वृक्षों का
मत रोको मुझे
मत बांधो मुझे
उर्ढ़ने दो
खुली हवाओं में
इस द्डाल से उस द्डाल तक!
हे मानुष,
खोल दो पिंजरा,
तोर दो बंधन,
आजाद रहना ही हमारा  जीवन है!







,



Wednesday, January 25, 2012

यह हसीं पल....

तेरी यादों की डोरी से
बंधे कुछ पल हैं,
सपनों की तरह  सजे,
यह  हसीं पल हैं!
 न यह डोरी टूटें
न यह सपने टूटें
तेरे प्यार से सजे
यह हसीं पल हैं.

न इस रात की सुबह हो,
न इस इश्क का कोई वैरी हो
मेरी धरकन  में बसे
यह हसीं पल हैं.

तेरी धरकन से बंधीं मेरी सांसें हैं,
मेरी सांसों में बसी तेरी खुश्बू है,
तेरी खुशबू  से महके,
यह हसीं पल हैं.
 न यह तेज़ धरकनों से डरें,
न यह गरम साँसों से जलें,
तेरे-मेरे प्यार के सपने,
यह हसीं पल हैं.

न ज़माने का  हो दस्तूर,
न इश्क को कोई करे मजबूर,
मेरे इरादों में बसे
यह हसीं पल हैं.


 तेरे दर्द में छुपे मेरे आंसू हैं,
मेरे आसुंओं में छुपा तेरा दर्द,
इस दर्द से तपे
यह हसीं पल हैं.
न यह दर्द कम हो,
न आसुओं का सैलाब रुके ,
तेरे-मेरे दर्द में बहे
यह हसीं पल.

न दर्द की दवा हो,
न आंसुओं पर बाँध,
तेरी-मेरी मुस्कराहट में छिपे,
यह हसीं पल.




 
 


Thursday, September 15, 2011

मंजिल की चाह में...

बहुत दिन भटके हैं हम,
इस राह से से उस राह तक,
मंजिल की चाह में.

हर पत्थर को पूजा है,
बहुत प्यार से संजोया है,
हर ज़र्रे को आँखों में बसाया है
मंजिल की चाह में,
इस राह से उस राह तक.

हर ठोकर को अपनाया है,
होंठों से चूमा है,
धुल को काजल बनाया है,
मंजिल की चाह में,
इस राह से उस राह तक.

हर टूटी राह पर चले है,
ज़ख्मों को हंस कर सहा है,
आंसुओं से हर ग़म धोया है,
मंजिल की चाह में,
इस राह से उस राह तक.

हर वोह पल साँसों में बसे हैं,
टूटे हुए सपने आँखों से झलकते  हैं,
बिखरी हुई आशा को  समाया है,
मंजिल की चाह में,
इस राह से उस राह तक.

हर मंजिल को छु लिया है,
हँसते हँसते हर मुकाबला किया है
हर इच्छा को पूरा किया है,
पर अब न भटकेंगे हम,
इस राह से से उस राह तक,
क्यूंकि मंजिल की चाह में
मंजिल को पा लिया है!








Thursday, September 8, 2011

तरस गए हम....

तरस गए हम,
मौसम न जाने बदलेगा कब,
गरम हवाओं  से थक गए हम,
यह बादल जाने बरसेगा कब ?

तरस गए हम,
अन्धकार छटेगा  कब,
सनसनी आवाजों से डर गए हम,
यह सूरज जाने निकलेगा कब?

तरस गए हम,
 सन्नाटा  टूटेगा कब,
खामोशियों से घबरा गए हम,
प्यार का गीत सुनेगा कब?

तरस गए हम,
एकेलापन छूटेगा कब,
तनहाइयों में रो पढ़े हम,
साथ तेरा मिलेगा कब?

तरस गए हम,
इंतज़ार ख़तम होगा कब,
राह तकते तकते थक गए हम,
दीदार तेरा होगा कब?